570 करोड़ की डिस्टिलरी: खिमसेपुर के लिए विकास या नया विवाद?
रोजगार के वादों के बीच पर्यावरण और सामाजिक प्रभावों को लेकर उठे सवाल
✍️पंकज सिंह भदौरिया ✍️
( उत्तर प्रदेश)। जिले के खिमसेपुर गांव में 570 करोड़ रुपये के निवेश से डिस्टिलरी और ब्रुअरी स्थापित करने की तैयारी है। परियोजना के तहत 40 एकड़ में प्लांट लगाया जाएगा, जहां रोजाना 300–400 टन अनाज और 600 टन आलू का प्रसंस्करण प्रस्तावित है। जमीन का आवंटन उत्तर प्रदेश राज्य औद्योगिक विकास प्राधिकरण (UPSIDA) द्वारा किया गया है। कंपनी का दावा है कि इससे करीब 350 प्रत्यक्ष और 1000 परोक्ष रोजगार सृजित होंगे और किसानों से आलू, मक्का, चावल व जौ की सीधी खरीद होगी। उत्पादन नवंबर 2026 तक शुरू करने का लक्ष्य बताया गया है।

रोजगार बनाम पर्यावरण: ग्रामीणों के लिए की चिंता जहां एक ओर परियोजना को औद्योगिक विकास की दिशा में बड़ा कदम बताया जा रहा है, वहीं स्थानीय ग्रामीणों और सामाजिक संगठनों के बीच कई आशंकाएं सामने आ रही हैं। खेती योग्य जमीन और भूजल पर संभावित असर प्रदूषण और दुर्गंध की समस्या आसपास के गांवों में स्वास्थ्य जोखिम शराब उत्पादन से सामाजिक प्रभाव पर्यावरण विशेषज्ञों का कहना है कि ग्रामीण क्षेत्र में डिस्टिलरी जैसी इकाइयों के लिए सख्त पर्यावरणीय मानकों, अपशिष्ट प्रबंधन और भूजल संरक्षण की प्रभावी व्यवस्था जरूरी होती है।

परियोजना की पर्यावरणीय स्वीकृतियां सार्वजनिक की जाएं
सामाजिक प्रभाव आकलन (Social Impact Assessment) कराया जाए
भूजल और वायु गुणवत्ता की स्वतंत्र निगरानी सुनिश्चित हो
सवाल यही: सपनों की फैक्ट्री या संकट की शुरुआत?
खिमसेपुर में प्रस्तावित यह फैक्ट्री किसानों के लिए स्थायी बाजार और युवाओं के लिए रोजगार का अवसर बन सकती है। वहीं, यदि निगरानी और नियमों का कड़ाई से पालन नहीं हुआ तो पर्यावरण और सामाजिक ताने-बाने पर असर की आशंकाएं भी नजरअंदाज नहीं की जा सकतीं।
उत्तर प्रदेश सरकार के सामने चुनौती है
औद्योगिक निवेश को बढ़ावा देते हुए ग्रामीण हित, पर्यावरण संरक्षण और सामाजिक संतुलन को समान रूप से सुरक्षित रखना।
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