MPLUN में टेंडर घोटाले का आरोप: MPPWD सर्कुलर को दरकिनार कर ‘अपनों को फायदा पहुंचाने की कोशिश
रिटायरमेंट से पहले इंजीनियर साहब पर नियम बदलने का आरोप
भोपाल/ मध्यप्रदेश लैंड यूटिलाइजेशन निगम (MPLUN) में जारी टेंडर प्रक्रिया एक बार फिर गंभीर सवालों के घेरे में आ गई है। आरोप है कि हाल ही में जारी टेंडरों में MPPWD का अनिवार्य सर्कुलर दिनांक 8-9-2025 जानबूझकर नहीं लगाया गया, ताकि कुछ चुनिंदा ठेकेदारों को अनुचित लाभ पहुंचाया जा सके। सूत्रों के अनुसार, MPLUN में चाहे कोई भी टेंडर जारी हो, उसकी शर्तें एवं प्रक्रिया MPPWD के नियमों के तहत ही खोली जाती हैं, लेकिन इस बार नियमों को ताक पर रख दिया गया। बताया जा रहा है कि एक वरिष्ठ इंजीनियर अधिकारी ने अपने करीबी ठेकेदारों को फायदा पहुंचाने के उद्देश्य से पूरी टेंडर प्रक्रिया के नियम ही बदल डाले।
ठेकेदारों ने उठाई आपत्ति, लेकिन अनसुनी कर दी गई
विभाग से जुड़े कुछ ठेकेदारों ने जब टेंडर दस्तावेजों में MPPWD सर्कुलर के अभाव पर औपचारिक आपत्ति दर्ज कराई, तो उनकी बातों को पूरी तरह नजरअंदाज कर दिया गया। इसके बाद मामला धीरे-धीरे विभागीय गलियारों से निकलकर मीडिया तक पहुंच गया।
मीडिया में मामला आने के बाद भी प्रक्रिया पर सवाल
मीडिया के सवालों पर MD ने दिए मौखिक जांच के आदेश
पत्रकार पंकज सिंह भदोरिया ने इस पूरे मामले को लेकर सीधे मैनेजिंग डायरेक्टर दिलीप कुमार से संपर्क किया और टेंडर प्रक्रिया में संभावित भ्रष्टाचार की आशंका से अवगत कराया। साथ ही उन्हें बताया गया कि किस तरह नियमों को दरकिनार कर टेंडर आगे बढ़ाया जा रहा है। मामले को गंभीरता से लेते हुए मैनेजिंग डायरेक्टर ने विभाग के कुछ वरिष्ठ अधिकारियों को मौखिक जांच के आदेश भी दिए। इसके बाद यह माना जा रहा था कि टेंडर प्रक्रिया पर रोक लगेगी या उसे निरस्त किया जाएगा।
15 दिन बाद रिटायर होने वाले साहब की ‘अंतिम चाल’?
लेकिन कहानी यहीं खत्म नहीं होती। सूत्रों का दावा है कि 15 दिन बाद रिटायर होने वाले उक्त अधिकारी अब जाते-जाते भी “कुछ माल कमाने” की फिराक में हैं। आरोप है कि उन्होंने अपने करीबी अधिकारियों के साथ बैठक कर कहा—“ग्वालियर मेले में साहब और कई वरिष्ठ अधिकारी जाने वाले हैं। जब वे बाहर रहेंगे और दो-तीन दिन में मामला शांत हो जाएगा, तब चुपचाप टेंडर प्रक्रिया पूरी कर दी जाएगी।”यह बयान अगर सही है, तो यह न केवल प्रशासनिक नैतिकता पर सवाल खड़ा करता है, बल्कि यह भी दर्शाता है कि सेवानिवृत्ति के अंतिम दिनों तक लालच खत्म नहीं हुआ।
इस मामले को कुछ ngo लोकायुक्त और ईओडब्ल्यू से जांच की मांग
उठा सकते है कि ऐसे अधिकारियों पर लोकायुक्त और आर्थिक अपराध अन्वेषण ब्यूरो (EOW) की जांच बैठाई जाए, ताकि यह साफ हो सके कि टेंडर प्रक्रिया में किन-किन स्तरों पर नियमों का उल्लंघन हुआ और किसे फायदा पहुंचाने की कोशिश की गई।
अब बड़ा सवाल—टेंडर रद्द होगा या नियमों के खिलाफ खुलेगा?
फिलहाल सबसे बड़ा सवाल यही है कि
प्रबंधन दबाव में आकर टेंडर को निरस्त करेगा?
इस पूरे घटनाक्रम पर अब विभाग, शासन और जांच एजेंसियों की नजरें टिक सकती हैं। आने वाले दिनों में यह मामला MPLUN के लिए एक बड़ी परीक्षा साबित हो सकता है।
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