गुजरात जा रही शराब पर पुलिस का डंडा, आबकारी का पर्दा

अलीराजपुर–झाबुआ–धार शराब तस्करी का त्रिकोण बना हॉटस्पॉट 

अलीराजपुर/झाबुआ गुजरात में शराबबंदी है यह जानकारी फिलहाल अलीराजपुर, झाबुआ और धार में सिर्फ पुलिस के पास सुरक्षित बची है। आबकारी विभाग शायद इसे पुरानी फाइल मान चुका है। हालात यह हैं कि पुलिस डंडा लेकर हाईवे पर खड़ी है, शराब से भरे ट्रक पकड़ रही है, जबकि आबकारी विभाग उसी नाके के आसपास “निरीक्षण मुद्रा” में खड़ा होकर दृश्य का आनंद लेता नजर आता है।

4 दिसंबर 2025: जब पुलिस ने फिर याद दिलाई जिम्मेदारी 

4 दिसंबर 2025 को पुलिस ने एक बड़े ट्रक को पकड़ा, जो गुजरात की ओर शराब लेकर जा रहा था। ट्रक में London Pride ब्रांड की शराब की पेटियां भरी हुई थीं। शराब जब्त हुई, कार्रवाई हुई, तस्वीरें आई

 आबकारी विभाग की तरफ से वही वर्षों पुराना राग“हमें तो खबर ही नहीं थी।”

 नाका है, शराब है, अधिकारी हैं… बस कार्रवाई नहीं 

स्थानीय लोगों का कहना है कि आबकारी नाके अब चेक-पोस्ट नहीं, बल्कि प्रदर्शनी स्थल बन चुके हैं—जहां ट्रक आते-जाते देखे जाते हैं, रोके नहीं जाते। पुलिस दौड़ती है, पूछताछ करती है, केस दर्ज करती है, जबकि आबकारी अधिकारी हालात पर ऐसे नजर रखते हैं जैसे किसी धारावाहिक का अगला सीन चल रहा हो।

18 महीनों में 20 ट्रक, संयोग से अधिकतर पुलिस ने पकड़े 

आंकड़े बताते हैं कि पिछले 18 महीनों में करीब 20 शराब से भरी गाड़ियां पकड़ी गईं। दिलचस्प संयोग यह कि ज्यादातर मामलों में कार्रवाई पुलिस ने की, न कि आबकारी विभाग ने। आबकारी अक्सर बाद में प्रकट होती है—कागज, पंचनामा और “औपचारिक उपस्थिति” के साथ।

 पुलिस बनाम आबकारी: 

दो विभाग, दो दर्शन एक तरफ—पुलिस: नाका, तलाशी, जब्ती, जवाबदेही दूसरी तरफ— आबकारी: नाका सामने, हाथ मुंह पर, और बयान तैयार—“सूचना नहीं मिली” अब सवाल यह है कि जब सूचना पुलिस तक पहुंच रही है, तो आबकारी तक क्यों नहीं?

अलीराजपुर–झाबुआ–धार: तस्करी का विशेष कॉरिडोर? 

स्थानीय चर्चाओं में यह सवाल भी उठ रहा है कि आखिर क्यों अलीराजपुर, झाबुआ और धार जिले गुजरात जाने वाली शराब के लिए इतने महत्वपूर्ण बन गए हैं? सूत्रों का दावा है कि यही वजह है कि कुछ अधिकारी इन जिलों में लंबे समय तक टिके रहने के इच्छुक रहते हैं।

पूर्व आबकारी अधिकारी धर्मेंद्र भदोरिया का नाम भी चर्चाओं में है, जो लंबे समय तक अलीराजपुर में पदस्थ रहे। 200 करोड़ की सम्मति कहा से अर्जित जांच एजेंसियों की पड़ताल में धर्मेंद्र भदौरिया द्वारा जुटाया काला धन उजागर हुआ क्या बसंती भूरिया के पास भी काला धन अर्जित हो रहा है 

London Pride और फैक्ट्री का सवाल

4 दिसंबर को पकड़े गए ट्रक में मौजूद London Pride ब्रांड की शराब को लेकर भी चर्चाएं हैं। बताया जा रहा है कि इस ब्रांड की बॉटलिंग शराब कारोबारी पिंटू भटिया के प्लांट पर होती है। सवाल यह भी उठ रहा है कि अगर फैक्ट्री, परिवहन और बॉर्डर—सब कुछ तय है, तो जिम्मेदारी रास्ते में ही क्यों गायब हो जाती है?

मिलीभगत या मजबूरी? 

स्थानीय स्तर पर यह चर्चा आम है कि गुजरात शराब तस्करी का यह कारोबार आबकारी विभाग, शराब फैक्ट्री मालिकों और माफियाओं की कथित मिलीभगत से चल रहा है। यही वजह है कि कार्रवाई अक्सर ड्राइवरों और छोटे लोगों तक सीमित रह जाती है, जबकि “सिस्टम” सुरक्षित रहता है।

क्या आबकारी विभाग सिर्फ लाइसेंस बांटने तक सीमित रह गया है? 

आबकारी विभाग घरों के लिए₹500 में लाइसेंस देने के लिए तैयार है लेकिन शराब माफियाओं पर कार्यवाही के नाम पर इतना सुस्त क्यों दिखाई देता है

 क्या “हमें खबर नहीं थी” कोई आधिकारिक नीति बन चुकी है? 

 गुजरात तक पहुंच रही शराब क्या रास्ते में अदृश्य हो जाती है? 

पुलिस की लगातार कार्रवाइयों ने यह तो साबित कर दिया है कि शराब तस्करी कोई छुपा हुआ खेल नहीं है। अब देखना यह है कि आबकारी विभाग कब पर्दा हटाकर मंच पर आता है, या फिर यह तमाशा यूं ही चलता रहेगा।