भ्रामक आरोपों पर जनसंपर्क विभाग का स्पष्टीकरण

कमीशन और बजट ट्रांसफर के आरोप निराधार विभागीय प्रक्रिया पूरी तरह पारदर्शी

प्रतिदिन की पाँच प्रतियों सहित एक वर्ष का रिकॉर्ड मांगेगा जनसंपर्क 

मुख्यमंत्री की छवि को धूमिल करने की साजिश
 

(पंकज सिंह भदौरिया)
भोपाल।
जनसंपर्क विभाग पर लगाए जा रहे 50 करोड़ और 100 करोड़ रुपये के भुगतान तथा कथित कमीशनखोरी के आरोपों को विभागीय सूत्रों ने पूरी तरह भ्रामक, तथ्यहीन और दुर्भावनापूर्ण बताया है। विभाग का कहना है कि विज्ञापन वितरण और भुगतान की संपूर्ण प्रक्रिया शासन के नियमों, वित्तीय स्वीकृति और ऑडिट व्यवस्था के अंतर्गत होती है, जिसमें किसी भी प्रकार की व्यक्तिगत मनमानी या कमीशन की कोई संभावना नहीं है।

सूत्रों के अनुसार मप्र माध्यम को किया गया भुगतान पूर्व स्वीकृत योजनाओं और वैधानिक प्रक्रिया के तहत हुआ है

विभागीय अधिकारियों का कहना है कि बजट का आवंटन, विज्ञापन वितरण और भुगतान की पूरी प्रक्रिया शासन की वित्तीय प्रणाली से होकर गुजरती है। अनुमोदित सूची के दैनिकों को विज्ञापन न देने का आरोप भी निराधार बताया गया है। जनसंपर्क विभाग ने स्पष्ट किया है कि विज्ञापन वितरण अनुमोदित सूची, सर्कुलेशन, क्षेत्रीय आवश्यकता और अभियान की प्रकृति के आधार पर किया जाता है।विभागीय सूत्रों के अनुसार विज्ञापन भुगतान में देरी का कारण प्रशासनिक और वित्तीय औपचारिकताएँ होती हैं , न कि किसी प्रकार की साजिश या कमीशनखोरी।

तथ्यहीन आरोप लगाने वालों पर शीघ्र एफआईआर दर्ज करने की तैयारी भी की जा रही है

विभाग का कहना है कि विभागीय कार्यप्रणाली में सभी निर्णय सामूहिक रूप से और वरिष्ठ अधिकारियों की स्वीकृति के बाद लिए जाते हैं। किसी एक अधिकारी को जिम्मेदार ठहराना पूरी तरह अनुचित और तथ्यहीन है। राजनीतिक और प्रशासनिक जानकारों का मानना है कि इस तरह की खबरें मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव की पारदर्शी कार्यशैली और सुशासन की छवि को नुकसान पहुंचाने के उद्देश्य से फैलाई जा रही हैं। मीडिया मैनेजमेंट में अनुभवी महिला अधिकारियों को जिम्मेदारी देने की तैयारी को विभाग ने सकारात्मक पहल बताया है। शासन की प्रशासनिक नीति के तहत कुशल प्रबंधन, बेहतर समन्वय और आधुनिक कार्यशैली को बढ़ावा देने के उद्देश्य से यह कदम उठाया जा रहा है। सूत्रों का कहना है कि लगाए जा रहे आरोप बिना दस्तावेज, बिना आधिकारिक पुष्टि और केवल व्यक्तिगत आरोपों पर आधारित हैं। विभागीय स्तर पर किसी भी अनियमितता की पुष्टि नहीं हुई है और पूरी प्रक्रिया शासन की निगरानी तथा ऑडिट व्यवस्था के अंतर्गत संचालित हो रही है।